Saturday, 13 September 2014

राम राम जी |

आज कलयुग के युग में भी हम अपने चारो ओर हर जीव को भगवान् की प्राप्ति हेतु प्रयास करते हुए देखते हैं| कोई जीव कर्म के मार्ग पर चलकर, कोई ज्ञान के मार्ग  से, कोई भक्ति के मार्ग पर चलकर अथवा कोई और किसी मार्ग पर चलकर भगवान् को प्राप्त करने का प्रयास करता हुआ प्रतीत होता है| हर जीव भगवान्, धर्म, ज्ञान और मोक्ष की बातें करता है, प्राय: आजकल हर जगह, हर उम्र के जीव की बातों में ईशवर की चर्चा होती है प्रत्येक मनुष्य अपनी अपनी भक्ति, अपने अपने ज्ञान, अपने अपने श्रेष्ठ कर्मो की श्रेष्ठता को सिद्ध करता हुआ दिखाई पड़ता है| कई बार तो चर्चा के विषय को भी दुसरे के विषय से श्रेष्ठ साबित करता है| अथार्त श्रीराम को श्री कृष्ण से अथवा ईश्वर को अल्लाह से श्रेष्ठ बताने का प्रयास करता है| चर्चा कैसी भी हो परन्तु चर्चा का विषय आनंद तो देता ही है|

कोई जीव कर्म के मार्ग को कठिन बताता है, कोई कहता है भक्ति बहुत कठिन है, किसी जीव को ज्ञान का मार्ग समझ में नहीं आता| वह जिस मार्ग पर स्वंय चलता है उसको वह सरल और दुसरे मार्गो को कठिन कहता है अथवा उनमे दोष निकालने से भी नहीं चुकता, अपने पक्ष में वो हमारे मूल ग्रंथो का भी उदारहण देता है जो की सत्य होते हैं| और दूसरा व्यक्ति अपने मार्ग में पूर्ण श्रद्धा रखते हुए भी पहले के ज्ञान और तर्क की क्षमता के आगे अपने आप को बेबस पाता है| यह सब जानते हैं कि मंजिल सबकी एक है जैसे काशीजी  में अनेको लोग प्रतिदिन अलग अलग स्थान से और अलग अलग मार्गो से आते हैं पर पहुँचते काशीजी  में ही हैं|

अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर की प्राप्ति का कौन सा मार्ग हमें अपनाना चाहिए?

किसी जीव को ज्ञान मार्ग कठिन लगता है और किसी को भक्ति मार्ग| सरलता और कठिनता अथवा सुगमता और अगमता यह जीव जीव पर निर्भर है| जो व्यक्ति जिस कला में निपुण है, उसके लिए वही सुगम है, और जो निपुण नहीं है उसके लिए कठिन है|

जैसे काशीजी पहुँचने के मार्ग अलग अलग हैं, कोई किसी मार्ग से जाना पसंद करता है कोई किसी मार्ग से| कोई सड़क मार्ग से, कोई वायु मार्ग से कोई जल मार्ग से| हर जीव अपने सामर्थ्य, अपनी इच्छाशक्ति और अपनी योगत्या के अनुसार ही अपने गंतव्य स्थान की ओर चलने का विचार करता है| किसी की रीस करके अपना मार्ग बदलना उचित फल नहीं देता उसी प्रकार ईश्वर की प्राप्ति भी अपने ही चुने हुए मार्ग से की जानी चाहिए| पानी के उलटे बहाव को पार करने में जहाँ हाथी का बल काम नहीं आता और हाथी बहाव में बह जाता है वहीँ  छोटी सी मछली उलटे बहाव में भी तैर कर पार कर सकती है| और  अगर हम नमक और चीनी का मिश्रण बना कर उन्हें अलग अलग करना चाहें तो व्यक्ति कितना भी बुद्धिमान और कार्यकुशल हो वह अपनी असमर्थता प्रकट करता है परन्तु यही कार्य एक छोटी सी चींटी बड़ी सरलता से कर देती है|

हमें सरलता और कठिनता शब्द में उलझने की आवश्कता नहीं है| किन्तु हमें तो यह निर्णय करना चाहिए की हमारे लिए सुगम क्या है और अगम क्या है| हमारे अन्दर जिस भाव की भी अधिकता हो हमें उसी भाव को अपना मार्ग बना कर अपने ईश्वर की ओर चलने की चेष्टा करनी चाहिए|
श्रीरामचरितमानस में माँ शबरी भक्ति भाव से प्रभु श्रीराम को प्राप्त करती है|

सुग्रीव डर भाव से (सुग्रीव बाली के डर से ही श्रीराम के चरणों में आता है ) श्रीराम को प्राप्त करता है|
विभीषण लालच भाव से ( जैसे सुग्रीव के भाई बाली को मारकर श्रीराम ने सुग्रीव को राजा बना दिया) श्रीराम को प्राप्त करता है|
राक्षस शत्रु भाव से श्रीराम को प्राप्त करते हैं|

गोस्वामी तुलसीदास जी से जब पूछा गया की आपके श्रीराम डर भाव से भी, शत्रु भाव से भी, लालच भाव से भी और अन्य भाव से भी भजने पर मुक्ति दे देतें हैं पर यह तो किसी भी शास्त्र में नहीं है| तो श्री तुलसीदास जी बोले यह मेरे श्रीराम के कृपा शास्त्र में है|

जय श्री राम





Friday, 11 April 2014

श्रद्धा और विश्वास

जय राम जी की |
  
भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्‌॥

भावार्थ:-श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वतीजी और श्री शंकरजी की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते॥

यह श्रीरामचरितमानस के शुरू में ही श्री तुलसीदास जी ने लिखा है| आओ इस को समझने का प्रयास करें|

एक जीव के मन  में अनेको प्रकार के भाव उठते रहते हैं, कभी श्रद्धा का, कभी विश्वास का, कभी दया का, कभी क्रोध का, कभी परोपकार का, कभी अहंकार का, कभी काम का, कभी मोह का, कभी लोभ इत्यादि का| हर जीव इन अनेको भावो को महसूस करता है इसी कारण इसको विस्तार नहीं देते| यह सब भाव हर जीव केवल महसूस कर सकता है अगर हम जीव को किसी भी भाव को परिभाषित करने को कहें तो यह उस जीव के लिए अति कठिन कार्य होगा| चूँकि यह भाव हर जीव में उठते है तो दूसरा जीव इन भावो के नाम लेते ही इसे महसूस करके इस जीव की बात को समझ तो जाता है परन्तु वह भी इसे व्यक्त नहीं कर पाता| मुझे श्री राम भगवान् में विश्वास है यह सब कहते हैं पर विश्वास के भाव को व्यक्त करके समझा नहीं सकते| किसी भी भाव को हम आकार देने में समर्थ नहीं हैं| अगर कोई जीव विश्वास के भाव को समझना चाहे तो हम केवल उसे विश्वास के मिलते जुलते शब्द ही दे सकते हैं, समझाने में कठिनाई अनुभव करेंगे| श्रीरामचरितमानस में मुख्य मुख्य भावो को आकार दिया है जिससे प्राणी यह जान सके की वह अपने अच्छे भावो को कैसे  बल दे सके और निम्न भावो को ख़त्म कर सके|
श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वतीजी और श्री शंकरजी की वंदना करता हूँ|
अथार्थ श्रद्धा एक भाव है जिसका कोई रूप अथवा आकार नहीं होता उस श्रद्धा को माँ पार्वती का और विश्वास भाव को श्री शंकरजी का रूप देकर संबोधित किया है| श्रद्धा की मूर्ति माँ पार्वती हैं और विश्वास की श्री शंकर भगवान्| कैलाश पर्वत पर शंकर भगवान् विराजमान हैं, कैलाश पर्वत अचल और अडिग है अत: विश्वास भी अचल और अडिग होना चाहिए| भगवान् राम को हम सर्वश्रेष्ठ भाव (सच्चिदानंद) का रूप मानते हैं, श्री तुलसीदास जी ने श्री राम जन्म से पहले शिव पार्वती का प्रसंग भी इसलिए लिखा की जब तक जीव के ह्रदय में श्रद्धा और विश्वास नहीं होगा वह ईश्वर श्रीराम को जो की सर्वश्रेष्ठ भाव का रूप हैं, ह्रदय में धारण नहीं कर पायेगा| अगर जीव को अपने अंत:करण में ईश्वर को लाना है तो पहले जीव के हृदय में श्रद्धा और विश्वास को लाना होगा|

आओ इसे और विस्तार दें :-
भगवान् शिव और माँ सती श्री अगस्त्य जी के आश्रम में श्री राम कथा सुनने गए| वहां श्री अगस्त्य जी ने दोनों का पूजन अवम आदर सत्कार किया| भगवान् शिव ने सोचा की श्री अगस्त्य जी कितने महान होते हुए भी विनम्र हैं,  वक्ता होते हुए भी श्रोता का सम्मान कर रहें हैं और माँ सती जी ने सोचा की जो हमारा ही पूजन करता हो वह हमें क्या राम कथा सुनाकर ज्ञान देगा अत: माँ सती का श्री राम कथा में ध्यान ना लगा | जब वापस आते हुए माँ सती ने  श्री राम को पत्नी वियोग में रोते देखा, तथा शिवजी ने श्री राम को सच्चिदानंद परमधाम कहकर प्रणाम किया तो मन में संशय उत्पन्न हो गया| माँ सती प्रजापति दक्ष की कन्या है| दक्ष का भाव बुद्धि से है| एक व्यक्ति किसी कार्य में दक्ष है अथार्थ वह बुद्धिमान है, तो माँ सती बुद्धि की पुत्री हुई और बुद्धि में संशय अवम तर्क-वितर्क का भाव रहता है| विश्वास भाव के साथ श्रद्धा होती है संशय अथवा तर्क-वितर्क कदापि नहीं| इसलिए विश्वास रूपी शिव ने बुद्धि की पुत्री का त्याग कर दिया| जब माँ सतीके ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ की योगाग्नि में अपने शरीर को भस्म किया तो ईश्वर से वर माँगा की अगले जन्म में भी मुझे श्री शिवजी ही पति मिलें तो ईश्वर ने पुछा की क्या पिता भी बुद्धि {दक्ष} चाहिए तो माँ सती ने कहा अबकी बार चाहे मुझे पत्थर के घर जन्म दे देना जो की जड़ होता है परन्तु बुद्धि [दक्ष} पिता नहीं चाहिए | क्योंकि बुद्धि चलाये मान होती है और पत्थर जड़ होता है| और माँ सती का जन्म पर्वत राज {पत्थर } हिमालय के घर हुआ| और पर्वत के घर जन्म लेने से वह पार्वती कहलायीं| जब तक वह बुद्धि जो संशय और तर्क-वितर्क की थी श्रद्धा में परिवर्तित नहीं हुई, भगवान् शिव ने उसको नहीं अपनाया| माता पिता और सप्तऋषि ने चाहे कैसे भी इस श्रद्धा को विचलित करने का प्रयास किया हो यह श्रद्धा रूपी माँ पार्वती अडिग रही|  
इसी प्रकार मेघनाथ काम का भाव है, कुम्भकरण {जिसके घड़े के समान कान है और जो सदा अपनी प्रसंशा सुनना चाहता है} वह अहंकार का भाव है, रावण को मोह का प्रतीक कहा गया है| अथार्थ जीव का काम मर जाता है, अहंकार मर जाता है परन्तु मोह बड़ी ही कठिनाई से मरता है अत: श्री राम (सर्वश्रेष्ठ भाव ) को मोह को मारने में ही सबसे ज्यादा कठिन परिश्रम करना पड़ा| माता सीता को भक्ति,शक्ति और लक्ष्मी कहते हैं| श्री लक्ष्मण जी को वैराग्य,  श्री भरतजी को धरम का सार और श्री शत्रुघनजी को अर्थ के भाव का रूप दिया गया है| श्री हनुमान जी को सेवा, श्री सुग्रीव जी को डर अवम बालीजी को पुन्यभिमान का रूप बताया गया है|
श्री रामचरितमानस का पाठ करने से हमारे ह्रदय में जब श्रीराम (सर्वश्रेष्ठ भाव) आ जाता है तो सारे दूषित भावो का नाश होता है और जीव को इस प्रकार भक्ति प्राप्त होती है|

जय श्री राम




Friday, 14 March 2014

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥




 जय श्री राम

* होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥


भावार्थ:-जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। (मन में) ऐसा कहकर शिवजी भगवान्‌श्री हरि का नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गईं, जहाँ सुख के धाम प्रभु श्री रामचंद्रजी थे॥
यह प्रसंग उस समय का है जब माता सतीजी ने श्रीशिव भगवान् की बात पर विश्वास नहीं किया कि श्रीरामजी ही परमब्रह्म और ईश्वर हैं और माता सतीजी श्रीराम जी की परीक्षा लेने जा रही थी
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श्री शिव भगवान जो विश्वास के प्रतीक हैं, सदा सत्य बोलने वाले, त्रिकाल दर्शी, देवों के देव, ज्ञानी, योगी, और सतीजी के पति हैं और माता सती जिन्हें सारा संसार सर्श्रेष्ठ पतिवर्ता के रूप में पूजता है वह माता सती ही श्री शिव भगवान् जी के वचनों पर विश्वास नहीं कर पायी| तब श्रीशिवजी ने यह विचार किया कि श्रीरामजी ने कुछ और ही रचा है| जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। यह केवल और केवल माता सतीजी के सन्दर्भ में ही कहा जा सकता है कि साक्षात शिव भगवान के समझाने पर भी माता सती शिवभगवान जी की बात पर विश्वास नहीं कर सकीं| शंकरजी का यह कथन जीवमात्र के लिए नही है परन्तु केवल सती जी के सम्बन्ध में ही था। यह वचन उस स्थिति में उनके मुह से निकला जब उन्हें यह अनुभव हो चूका था कि श्रीराम जी ने सती जी के साथ जो लीला रच रखी है उसका कोई विशेष उद्देश्य है और वह होकर रहेगी। इसलिए शंकरजी की इस बात को जीव से घटाना ठीक नहीं। वैसे तो जो भगवान् के भक्त हैं और निश्चित रूप से प्रारब्भ पर निर्भर रहते हैं वे ऐसा कह सकते हैं और उनका कहना अनुचित नहीं होगा। क्योंकि प्रारब्भ का भोग अटल और अवश्यम्भावी होता है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं की प्रारब्भ पर निर्भर रहकर कुछ किया ही ना जाए। जो भक्त प्रारब्भ पर निर्भर रहते हैं वे भी भजन-ध्यानादि, परमार्थ- साधन तो करते ही हैं। अत: प्रारब्भ पर निर्भर रहनेवालोन को भी अपना कर्तव्य कर्म करते रहना चाहिए और प्रारब्भ को अवश्यम्भावी समझकर अनासक्ताभाव से भोगना चाहिए।यह हम जैसे मनुष्य के विषय की बात नहीं है क्योंकि हम बहुत ही सीमित सामर्थ्य और ज्ञान रखते हैं। तथा उस सीमित ज्ञान और सामर्थ्य के साथ किसी कार्य के पूर्ण होने की सम्भावना में भी संशय रहता है। कार्य पूर्ण न होने पर इसे श्रीरामजी की इच्छा अथवा होनी का नाम देना हम मनुष्य को शोभा नहीं देता। यह तो श्रीरामजी को दोषी करार करना हुआ जो की ठीक नहीं है।


आजके समय में प्रत्येक मनुष्य इस बात को एक दिन में अनेको बार दोहराता है| जब उसे उसके द्वारा किये गए किसी भी कर्म में वांछित सफलता प्राप्त नहीं होती| अपने आप को संतुष्ट करता हुआ वह इसे श्रीराम जी की एक रचना अथवा इच्छा होने का श्रेय देता दीखता है| उसकी मान्यता अनुसार तो इस संसार में कोई भी घटना अथवा दुर्घटना के पीछे श्रीरामजी की रचना अथवा इच्छा है| वह श्रीरामजी की इच्छा को मानकर मन में संतोष कर लेता है और अपनी असफलता के कारणों को जानने का प्रयास भी नहीं करता| और अपनी उन्नति का रथ रोक लेता है| पुन: वह इसे भी रामजी की ही इच्छा मानता है| क्या कोई मनुष्य श्री शिवभगवान जी से अथवा कोई स्त्री माता सतीजी से अपनी तुलना कर सकती है| क्या कोई भी मनुष्य शिव भगवान जैसे योगी, ज्ञानी ,त्रिकालदर्शी, सर्वसमर्थ, सर्वव्यापी होने का दावा कर सकता है| अगर नहीं तो उस मनुष्य को यह बात कहने का अधिकार नहीं है कि जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा।

हम जैसे मनुष्य अपने यथासंभव कर्म करें, पुरुषार्थ हेतु तत्पर रहें, सात्विक बुद्धि रखें और फिर सब कुछ करने पर अगर कुछ प्राप्त हो जाए तो श्रीराम कृपा कहें और अगर सब प्रयास करने पर भी सफलता ना मिले तो इसमें अपनी कमी को जानने का प्रयास करना चाहिए| दोषपूर्ण कर्म करने से, बिनाविचारे कार्य करने से, बिना पुरुषार्थ किये अथवा और भी किसी प्रकार की कमी रखते हुए अगर हम सफलता प्राप्त नहीं करते तो भी हम इसे राम इच्छा कहने का साहस नहीं करना चाहिए| अन्यथा हम श्री शंकर जी के वचन के अर्थ का अनर्थ करेंगे।

माँ सतीजी ने गलती करने के बाद भी ये नहीं विचारा था कि जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। ये श्रीशिव भगवान् जी ने विचारा था| अपनी कमी को श्रीराम जी की इच्छा या रचना ना माने। वर्ना हमारी प्रगति का मार्ग बंद हो जाएगा।

जय श्री राम

Tuesday, 4 February 2014

प्रभु श्रीरामजी की उदारता।



जय रामजी की।


माता सीता को जब रावण हरके ले जा रहा था तब मातासीता बहुत प्रकार से विलाप करने लगी जिसको सुनकर सभी जड़-चेतन जीव दुखी हो गए| गीधराज जटायु ने सीताजी की दुखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचंद्रजी की पत्नी है। नीच राक्षस माता सीता को लिए जा रहा है, जैसे कपिला गाय मलेच्छ के पाले पड़ गयी हो| वह बोला कि हे पुत्री सीते! भय मत करो। और जटायु रावण से युद्ध करने लगा और अपनी चोंचों द्वारा रावण के शरीर को घायल कर दिया तब रावण ने अपनी कटार निकालकर जटायु के पंख काट डाले | जटायु श्रीरामजी की अद्भुत लीलाका स्मरण करके पृथ्वी पर गिर पड़ा| कुछ समय पश्चात श्रीरामजी माता जानकी को खोजते हुए वहां पहुचे जहाँ जटायु श्रीरामजी के चरणों का स्मरण कर रहा था | कृपासागर श्रीरघुवीर ने अपने करकमल से उसके सिर का स्पर्श किया| श्रीरामजी का मुख देखकर उसकी सब पीड़ा जाती रही| तब धीरज धरकर जटायु ने ये वचन कहा –हे जन्म-मृत्यु के भय का नाश करने वाले श्रीराम! सुनिए | रावण ने मेरी ये दशा की है उसी दुष्ट ने जानकीजी को हर लिया है| हे प्रभु ! मैंने आपके दर्शनों के लिए प्राण रोक रखे थे | हे कृपानिधान ! अब ये चलना ही चाहते हैं| तब प्रभु श्रीरामजी ने कहा—हे तात! शरीर छोड़कर अब आप मेरे धाम को जाओ और सीताहरण की बात आप जाकर पिताजी से मत कहियेगा| यदि मै राम हूँ तो दशमुख रावण कुटुंबसहित वहां आकर स्वयं ही कहेगा| अखंड भक्ति का वर मांगकर जटायु श्रीहरि के परमधाम को चला गया| श्रीरामजी ने उसका  दाहकर्म यथायोग्य अपने हाथों से किया।

आओ इस प्रसंग के तत्व को समझें।|

रावण से युद्ध करने के बाद जब जटायु घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा और दर्द से कराहने लगा तो क्या उसने ये नहीं सोचा होगा कि  माता सीता को बचाने का कार्य सर्वश्रेष्ठ कार्य था परन्तु यह करने  के बाद भी मेरी यह दुर्दशा हुई, मेरे पंख कट गए, पृथ्वी पर पड़ा हूँ, लहुलुहान हूँ, पीड़ा से कराह रहा हूँ और मृत्यु के निकट हूँ| जैसे हम सब यह सोचतें हैं कि दुसरो का भला करने के बाद भी हम क्यों दुखी रहते हैं| यह जटायु ने भी सोचा होगा| पर यह वही जटायु है जो अपने भाई सम्पाती के साथ सूर्य को पकड़ने गया था और सूर्य के नजदीक पहुंचकर सम्पाती के पंख जलने लगे और यह दोनों वापस लौट आये| मात्र एक छोटे से सूर्य को नहीं पकड़ पाए और अपने पंख भी गवां दिए| लेकिन माता सीता के लिए अपने पंखों की आहुति देने का यह परिणाम हुआ कि जिसके रोम रोम में अनंत कोटि के ब्रह्माण्ड हैं, जिसके प्रकाश से अरबों खरबों सूर्य प्रकाशित होते हैं| उन श्री रामजी को स्वयं चलकर जटायु के पास आना पड़ा, जटायु को उनके पास नहीं जाना पड़ा|  जटायु के सिर को गोद में रखकर श्रीरामजी ने कहा अगर आप प्राण रखना चाहते हैं तो प्राण रख सकते हैं| जटायु कहने लगे आपकी गोद में प्राण त्यागने से तो इस शरीर की सार्थकता सिद्ध हो जायेगी| श्रीरामजी ने फिर कहा कि परलोक जाकर मेरे पिता से सीताहरण के बारे में मत कहना और अगर मै राम हूँ तो रावण अपने कुटुंब सहित आकर स्वयं बताएगा अथार्त मै उसको मार डालूँगा| महात्मा जटायु पहले तो यह सोचकर विस्मित हो गए कि क्या इस मांसभक्षी पक्षी गिद्ध, जिसका जन्म अधम योनी में हुआ है उसको श्रीरामजी वही लोक दे रहें हैं जो लोक  श्रीरामजी ने अपने  पिता श्री दशरथजी  को दिया हैं| तभी तो कह रहे हैं कि वहां जाकर मेरे पिता को सीताहरण के बारे में ना बताना| पुन: जब जटायु ने श्रीरामजी को यह कहते सुना कि रावण अपने कुटुंब सहित जाकर स्वयं श्री दशरथ जी को बताएगा तो जटायु श्रीरामजी के आगे नतमस्तक हो गया कि अपने परम शत्रु रावण को भी क्या श्रीरामजी वही लोक देंगे जो लोक श्रीरामजी ने अपने पिता श्री दशरथ जी को दिया है|

अथार्त श्रीरामजी से वियोग होने पर श्री दशरथ ने प्राण त्याग दिए और दशमुख रावण के प्राण श्रीरामजी से योग (मिलने पर) होने पर निकले परन्तु दोनों का परिणाम एक ही हुआ| श्रीरामजी को कोई भी जीव प्रेम अथवा वैर से याद करे, परिणाम सुखद होगा।

4.02.2014

Tuesday, 31 December 2013

भक्ति और भगवान्



जय श्रीराम

असीम ब्रह्म कैसे ससीम होकर माँ कौशल्या अथवा यशोदा मैया की गोद में समां जाता है।

रामचरितमानस में जब प्रभु की भुजा काक्भुशुन्दी जी को पकड़ने दोड़ी तो वह भुजा सदा मात्र दो अंगुल के अन्तर से पीछे रही। और वृन्दावन में जब यशोदा मैया नटखट भगवान् श्यामसुंदर को बाँधने की कोशिश करती हैं तो सारे वृन्दावन की रस्सी भी मात्र दो अंगुल के फर्क से छोटी रह जाती है। 
जब भगवान् जी से पूछा गया की यह दो अंगुल का क्या रहस्य है तो वह मुस्कुराकर बोले एक अंगुल तो मेरी कृपा का है और दूसरी अंगुल जीव की इच्छा का है। जब तक जीव मुझे पकड़ने का प्रयास नहीं करेगा और फिर मै उस जीव पर कृपा नहीं करूँगा तो हमारा मिलन संभव नहीं होगा। अगर इश्वर और भक्त एक दुसरे को पकड़ने का पर्यास नहीं करते तो जीव और इश्वर का मिलन नहीं होगा।
इश्वर को श्रीराम विवाह के समय माँ सीता की पंचरंगी चुनरीके छोर द्वारा बाँधा गया और फिर श्यामसुंदर भगवान् जब राधारानी के बरसाने से रस्सी मंगवाई गयी तो भी भगवान् बन्ध गए।
जिस माँ की गोद में जाकर व्यापक ब्रह्म इतना छोटा हो गया उसके हाथ मे अगर रस्सी भी आकर छोटी हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। माँ यशोदा के हाथ में रस्सी छोटी होने का कारण भगवान् श्यामसुंदर नहीं थे। क्योंकि भगवान् ने रस्सी से न बंधने के लिए अपने शरीर को तो बड़ा नहीं किया था फिर माँ यशोदा क्यों नहीं बाँध पायी। इसका कारण एक तो क्रोध के कारण बांधना चाहती थी और दूसरी ओर प्रेम के कारण उन्हें बाँधने में संकोच हो रहा था इसी कारण रस्सी छोटी रह जाती थी। माँ के क्रोध और संकोच के कारण दो अंगुल का फर्क रहा। मन में अगर किसी प्रकार का संशय है तो इश्वर को नहीं बाँधा जा सकता। तात्पर्य यह है कि भगवान् भक्ति के बंधन से बन्ध सकते हैं। माता सीता और राधारानी भक्ति का स्वरुप है। एक बार भक्ति के बंधन में जकड़े जाने के पश्चात इश्वर भक्ति देवी का ही अनुसरण करते दिखाई देते है। श्रीराम विवाह में माँ सीता की चुनरी से बंधे श्री राम श्री सीता के पीछे पीछे चलकर विवाह पूर्ण करते हैं।
जो इश्वर का पीताम्बर असीम है और जिसका कोइ छोर नहीं है जिसकी सीमा नहीं है वह इश्वर भी जब भक्ति की चुनरी के साथ बंधता है तो ससीम हो जाता है और फिर वह पकड़ा जा सकता है।

जय श्री राम
05.12.2013

Sunday, 29 December 2013

ईश्वर की समदर्शिता


जय राम जी की।




ईश्वर समदर्शी हैं अथार्त ईश्वर सब पर समान दृष्टि रखते हैं| इस धारणा से हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ईश्वर सबको समानता से देखते हैं| इस  दृष्टिकोण से हम यह मानते हैं कि हम छोटे हैं अथवा बड़े, निर्बल है या बलवान, ज्ञानी हैं या अज्ञानी, धनहीन हैं या धनवान, ईश्वर हम सब पर समदृष्टि रखते हैं| इसको और विस्तार देकर हम यह भी मान सकते हैं कि दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊँच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन (सुंदर जीवन)-मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, सम्पत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य यह अपने आपमें विपरीत होकर भी ईश्वर की समदृष्टि के दृष्टिकोण के द्वारा समान रूप से देखे जाते हैं| ईश्वर भेदबुद्धि नहीं रखते और सबको समान समझते हैं|

 अब प्रश्न यह उठता है कि फिर श्रीरामजी ने सुग्रीव को प्रेम और बाली को मृत्यु क्यों दी, क्यों श्री हनुमानजी से प्रथम भेंट में ही श्री लक्ष्मणजी के सामने श्री हनुमानजी को “ तुम मम प्रिय लक्ष्मण से दूना “ और फिर रावण वध के पश्चात अयोध्या में अपने सब मित्रों को श्रीभरत से दूना प्रिय बताया| अगर ईश्वर समदर्शी हैं तो ईश्वर दूना और चौगुना की भाषा क्यों बोलते हैं|

 अब प्रश्न यह भी उठता है कि अगर कोई बलवान किसी निर्बल को मारता है तो ईश्वर को क्या, समदर्शी होने हेतु निर्बल की रक्षा नहीं करनी चाहिए? क्योंकि ईश्वर समदर्शी हैं उनकी दृष्टि में निर्बल और बलवान समान हैं, तो इसमें भी ईश्वर के समदर्शी होने की सार्थकता सिद्द नहीं होती|


आओ समझे श्रीरामचरितमानस में बाली के प्रसंग के सन्दर्भ से:-

यह सबको ज्ञात है कि बाली जो पुन्यभिमान का रूप है वह बाली रावण को हरा कर छ: महीने तक अपनी काख में दबा कर एक प्रमाणपत्र की तरह लोगों को दिखाता फिरा था| बाली रावण को मार तो सकता नहीं था पर अभिमान हेतु रावण पर अपनी विजय को दर्शाता फिरा, यह जानकर भी कि ईश्वर अवतार लेकर रावण को मारने वाले हैं|

 जब बाली सुग्रीव से युद्ध करने निकला तो उसकी पत्नी तारा ने बताया कि सुग्रीव ने जिनसे मित्रता की है वे बहुत बलवान हैं तो बाली बोला वह तो साक्षात ईश्वर हैं| बाली ने ईश्वर के स्वरूप को जानने की घोषणा भी की, बाली जानता था कि ये ईश्वर हैं फिर भी वह युद्ध करने गया तब श्रीतुलसीदास जी ने लिखा “अस कहि चला महा अभिमानी “ तात्पर्य यह है कि जिसकी वाणी में ज्ञान होने पर भी भीतर अभिमान भरा हो तो वह तो महा अभिमानी है | इसीलिए श्रीराम बाली को बाण मारते हैं और बाण लगते ही बाली का अहंकार दूर हो गया| अब केवल पुन्य रह गया| तब बाली ने पूछा कि “ मैं बैरी सुग्रीव पियारा “ तो श्रीराम ने बाली से कहा, मुझे बाध्य होकर तुम्हारे ऊपर बाण चलाना पड़ा| मेरे बाण चलाने का मतलब यही है कि फोड़ा होने पर जैसे चिकित्सक अस्त्र द्वारा फोड़े को काट डालता है यह अभिमान भी एक फोड़ा था जिसे मैंने काट दिया।इसके पश्चात् श्रीराम ने बाली को प्राण रखने को कहा| परन्तु बाली बोला मेरा जीवन तो आपके दर्शन से ही सार्थक हो गया अब मै प्राण नहीं रखना चाहता।  तब प्रभु श्री राम बोले की चलो यहाँ नहीं रहना चाहते तो मेरे धाम चलो तुम्हारा धाम मैंने सुग्रीव को दे दिया तुम मेरे धाम चलो | प्रभु के प्रेम में भी कृपा है और क्रोध में भी कल्याण है । सुग्रीव से प्रेम किया और उसे राज्य दिया, बाली पर प्रहार किया उसे अपना धाम दे दिया ।

माता शबरी ने प्रभु श्रीराम को सुग्रीव से मित्रता करने को कहा था क्योंकि वह जानती थी कि सुग्रीव निरभिमानी है और बाली अभिमानी है| माता सीता का पता अभिमान के रहते हुए कोई नहीं लगा सकता क्योंकि भक्ति केवल अभिमान त्यागने से ही प्राप्त हो सकती है|

ईश्वर जब तक निराकार, निर्गुण है वह सूर्य की भांति सबको समान रूप से प्रकाश देते हुए समदर्शी है। जब वही ईश्वर आकार लेकर अवतरित होता है तो वह भी गुणात्मक हो जाता है और उसके यहाँ भी एक दुनी दो और दो दुनी चार होता प्रतीत होता है।

जय श्रीराम

29.12.2013


Wednesday, 18 December 2013

श्रीहनुमानजी

श्रीहनुमानजी









जय रामजी की |

माता सीता के हरण के पश्चात श्रीराम जी ने सुग्रीव को माता सीता का पता लगाने का काम सौंपा और सुग्रीव ने अनगनित वानर इकठ्ठे कर दिए|  श्रीराम जी ने वह अंगूठी जिस पर राम लिखा था श्री हनुमान जी को  दी और उस अंगूठी को श्री हनुमान जी ने मुंह में डाल लिया| और जब लंका में अशोक वृक्ष पर श्री हनुमान जी बैठे थे तो वह अंगूठी माता सीता के उपर डाल दी|

 आओ इस पर विचार करें:-

माता सीता इस ब्रहमांड के सबसे बड़े वेदांत परम्परा को मानने वाले श्री जनक की पुत्री है| वेदांत को मानने वाले देह अभिमान से ऊपर होते हैं| माता सीता का जन्म वैसे भी किसी देह से उत्पन्न नहीं हुआ था तभी हम माता सीता को वैदेही भी कहते हैं और जनकपुर में सब व्यक्ति ब्रहमज्ञानी हैं इसी कारण वश उस राज्य को विदेहराज भी कहा जाता है| उस राज्य में कोई भी निवासी देह का अभिमान करने वाला नहीं होता सब इस देह अभिमान से उपर उठे होते हैं| इसी कारणवश माता सीता जिनको हम लक्ष्मी, भक्ति और शक्ति भी कहते हैं उन्हें बिना किसी प्रयास के प्राप्त हो गयीं|

श्रीराम और श्री लक्ष्मण वन में माता शबरी के कथनुसार सुग्रीव जी को खोज रहे थे तब सुग्रीव जी ने श्री राम और श्री लक्ष्मण को देख कर डरते हुए हनुमान जी से कहा कि ये जो दो सिंह पुरुष वन में विचर रहें हैं इनका पता लगाओ कहीं ये बाली के भेजे हुए ना हो और मेरा वध करने आयें हो| तब श्री हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और प्रभु श्री राम के सम्मुख होकर उनका परिचय माँगा| प्रभु ने कहा कि हम कोसलराज दशरथ के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन में आयें हैं| हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं | मेरी पत्नी सीता को किसी राक्षस ने हर लिया और हम उसे ही खोज रहें हैं| यह तो थी हमारी कथा अब आप अपनी कथा सुनाएँ| प्रभु को पहचान कर श्री हनुमान जी ने स्तुति की और कहा आपका परिचय पूछना तो न्याय था परन्तु आप मनुष्य की तरह मेरा परिचय क्यों पूछ रहें हैं| तब श्री हनुमान जी ने कहा :-

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल ह्रदय अज्ञान |

पुनि प्रभु मोहि बिसरेउ दीनबंधु भगवान् ||

एक तो मैं यों ही मंद हूँ, दूसरे मोह के वश में हूँ, तीसरे ह्रदय का कुटिल और अज्ञान हूँ, फिर आपने भी मुझे भुला दिया|

तात्पर्य यह है कि यहाँ श्री हनुमान जी ने ये नहीं कहा की मै हनुमान हूँ, अंजनी पुत्र हूँ, पवनसुत हूँ, शंकर सुवन केसरीनंदन हूँ अपितु अपनी इस देह का परिचय ना देकर,  अपने दोषों को प्रगट करते हुए कहते हैं की प्रभु मैं आपको पहिचान नहीं सका| उनके इस तरह से परिचय देने से श्रीराम समझ गए कि हनुमानजी में देह अभिमान ना होकर देह होने का भी भान नहीं है| (वैसे भी वायु की  कोई देह नहीं होती )  और फिर श्रीराम ने निर्णय किया कि जिसको देह अभिमान नहीं है वह ही वैदेही का पता लगा सकता है| यह जानकार ही अपनी अंगूठी श्रीहनुमानजी को दी| जब वह अंगूठी श्रीहनुमानजी ने मुंह में डाली तो श्रीराम ने कारण पुछा तो श्रीहनुमान जी बोले प्रभु भक्ति माता को खोजने के लिए मुंह में राम का नाम होना आवश्यक है| अगर मुहं में रामनाम होगा तभी भक्ति देवी प्राप्त होंगी|

लंका में श्रीहनुमान जी अशोकवृक्ष पर बैठकर माता सीता का विलाप सुनते हैं जब माता सीता अशोकवृक्ष से अंगार मांगती हैं तब श्रीहनुमान जी मन में विचार करके अंगूठी डाल देते हैं यह सोचकर कि माता सीता को अंगार की अपेक्षा राम ही माँगना चाहिए| श्रीराम का प्राप्त होना ही सब दुखों का निवारण है|

आज के युग में भी हर व्यक्ति शक्ति, भक्ति और लक्ष्मी की खोज में लगा है, सारे प्रयास इनको प्राप्त करने में ही लग रहें हैं ये केवल दुवापर युग की ही बात नहीं है| परन्तु ये भक्ति ,शक्ति और लक्ष्मी  श्रीहनुमानजी जैसे देह अभिमान से ऊपर उठे व्यक्ति को ही प्राप्त होगी|

18.12.2013