Friday, 14 March 2014

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥




 जय श्री राम

* होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥


भावार्थ:-जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। (मन में) ऐसा कहकर शिवजी भगवान्‌श्री हरि का नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गईं, जहाँ सुख के धाम प्रभु श्री रामचंद्रजी थे॥
यह प्रसंग उस समय का है जब माता सतीजी ने श्रीशिव भगवान् की बात पर विश्वास नहीं किया कि श्रीरामजी ही परमब्रह्म और ईश्वर हैं और माता सतीजी श्रीराम जी की परीक्षा लेने जा रही थी
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श्री शिव भगवान जो विश्वास के प्रतीक हैं, सदा सत्य बोलने वाले, त्रिकाल दर्शी, देवों के देव, ज्ञानी, योगी, और सतीजी के पति हैं और माता सती जिन्हें सारा संसार सर्श्रेष्ठ पतिवर्ता के रूप में पूजता है वह माता सती ही श्री शिव भगवान् जी के वचनों पर विश्वास नहीं कर पायी| तब श्रीशिवजी ने यह विचार किया कि श्रीरामजी ने कुछ और ही रचा है| जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। यह केवल और केवल माता सतीजी के सन्दर्भ में ही कहा जा सकता है कि साक्षात शिव भगवान के समझाने पर भी माता सती शिवभगवान जी की बात पर विश्वास नहीं कर सकीं| शंकरजी का यह कथन जीवमात्र के लिए नही है परन्तु केवल सती जी के सम्बन्ध में ही था। यह वचन उस स्थिति में उनके मुह से निकला जब उन्हें यह अनुभव हो चूका था कि श्रीराम जी ने सती जी के साथ जो लीला रच रखी है उसका कोई विशेष उद्देश्य है और वह होकर रहेगी। इसलिए शंकरजी की इस बात को जीव से घटाना ठीक नहीं। वैसे तो जो भगवान् के भक्त हैं और निश्चित रूप से प्रारब्भ पर निर्भर रहते हैं वे ऐसा कह सकते हैं और उनका कहना अनुचित नहीं होगा। क्योंकि प्रारब्भ का भोग अटल और अवश्यम्भावी होता है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं की प्रारब्भ पर निर्भर रहकर कुछ किया ही ना जाए। जो भक्त प्रारब्भ पर निर्भर रहते हैं वे भी भजन-ध्यानादि, परमार्थ- साधन तो करते ही हैं। अत: प्रारब्भ पर निर्भर रहनेवालोन को भी अपना कर्तव्य कर्म करते रहना चाहिए और प्रारब्भ को अवश्यम्भावी समझकर अनासक्ताभाव से भोगना चाहिए।यह हम जैसे मनुष्य के विषय की बात नहीं है क्योंकि हम बहुत ही सीमित सामर्थ्य और ज्ञान रखते हैं। तथा उस सीमित ज्ञान और सामर्थ्य के साथ किसी कार्य के पूर्ण होने की सम्भावना में भी संशय रहता है। कार्य पूर्ण न होने पर इसे श्रीरामजी की इच्छा अथवा होनी का नाम देना हम मनुष्य को शोभा नहीं देता। यह तो श्रीरामजी को दोषी करार करना हुआ जो की ठीक नहीं है।


आजके समय में प्रत्येक मनुष्य इस बात को एक दिन में अनेको बार दोहराता है| जब उसे उसके द्वारा किये गए किसी भी कर्म में वांछित सफलता प्राप्त नहीं होती| अपने आप को संतुष्ट करता हुआ वह इसे श्रीराम जी की एक रचना अथवा इच्छा होने का श्रेय देता दीखता है| उसकी मान्यता अनुसार तो इस संसार में कोई भी घटना अथवा दुर्घटना के पीछे श्रीरामजी की रचना अथवा इच्छा है| वह श्रीरामजी की इच्छा को मानकर मन में संतोष कर लेता है और अपनी असफलता के कारणों को जानने का प्रयास भी नहीं करता| और अपनी उन्नति का रथ रोक लेता है| पुन: वह इसे भी रामजी की ही इच्छा मानता है| क्या कोई मनुष्य श्री शिवभगवान जी से अथवा कोई स्त्री माता सतीजी से अपनी तुलना कर सकती है| क्या कोई भी मनुष्य शिव भगवान जैसे योगी, ज्ञानी ,त्रिकालदर्शी, सर्वसमर्थ, सर्वव्यापी होने का दावा कर सकता है| अगर नहीं तो उस मनुष्य को यह बात कहने का अधिकार नहीं है कि जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा।

हम जैसे मनुष्य अपने यथासंभव कर्म करें, पुरुषार्थ हेतु तत्पर रहें, सात्विक बुद्धि रखें और फिर सब कुछ करने पर अगर कुछ प्राप्त हो जाए तो श्रीराम कृपा कहें और अगर सब प्रयास करने पर भी सफलता ना मिले तो इसमें अपनी कमी को जानने का प्रयास करना चाहिए| दोषपूर्ण कर्म करने से, बिनाविचारे कार्य करने से, बिना पुरुषार्थ किये अथवा और भी किसी प्रकार की कमी रखते हुए अगर हम सफलता प्राप्त नहीं करते तो भी हम इसे राम इच्छा कहने का साहस नहीं करना चाहिए| अन्यथा हम श्री शंकर जी के वचन के अर्थ का अनर्थ करेंगे।

माँ सतीजी ने गलती करने के बाद भी ये नहीं विचारा था कि जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। ये श्रीशिव भगवान् जी ने विचारा था| अपनी कमी को श्रीराम जी की इच्छा या रचना ना माने। वर्ना हमारी प्रगति का मार्ग बंद हो जाएगा।

जय श्री राम

16 comments:

  1. Hanuman ji said "Ram kaj kinhe bina mohi kahan vishram" . Yeh batata hai ki jab tak apna samarthya hai tab tak karya ko karna chahiye aur jab khatam ho jaye tab Prabhu par chodna chahiye.

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  2. बहुत सुदर jsk :)

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  3. मेरे विचार से, इस दोहे का प्रयोग हम लोग खुद को समझाने के लिए कर सकते हैं।

    सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेहु मुनि नाथ,
    हानि लाभ, जीवन मरनु, जसु अपजसु, बिधि हाथ।

    ये दोहा भी समान अर्थ देता है।

    किन्तु श्रीरामजी की इच्छा को मानकर मन में संतोष कर लेना और अपनी असफलता के कारणों को जानने का प्रयास भी न करना और फिर से प्रयत्न ना करना ये गलत है। कर्म तो करना ही चाहिए।

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  4. Yah ramcharit manas kiske ke liye likha gaya hai aur eska purpose kya hai aga es slok ko am ensan apni jivan me nahi anushran karega to aur slok kyu karega maine to suna hai ramcharitmanas darpan ke saman hai. pls eska answer dijiye as soon as posible.

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    1. Is shlok ko samajhne me bhagwadgita ki madad li ja sakti hai. Har manushy ke karm anusar usko phal milta hai. Aur manushy karm kiye bina nahi rah sakta. Agar manushy din bhar sota hai, toh iska matlab hai wo soneka karm kar raha hai, wo baithta hai toh baithne ka karm kar raha hai. Inme se har ek karm ka phal milna nishchit hai. Us phal ki ichha kiye bina nishkam bhav se jab koi manushy karm karne lagta hai toh uska harek karm bhagwan ki ichha se hone lagta hai. Usko har karm ke liye antarik prerna milti hai. Ye kewal unhi logoke sath hota hai jo apna sab kuchh prabhu ko saup chuke ho. Iske sivay bhi kabhi kabhi bhagwat prerna se kuchh kaam aapke hatho ho jate hai, jo aap apne vivek buddhi se kabhi nahi kar sakte the. Bas galati se ho jate hai. Aise anayas hi honewale karmoko bhagwat ichha maan kar chhod dena hi uchit hota hai. Kyuki aisi sthitiyon me vichar karnese koi labh nahi hota.

      Jo aapke haath me hai, us par aapne vichar karna chahiye, parantu jo aapke haath me hi nahi, uske vishay me vichar karke bhi toh koi labh nahi.

      Is sandarbh me hi dekha jaay, toh bhagwan shri shivji ne mata satiji ko samjhane aur rokne ka prayatn kiya, parantu mata satiji nahi maani. Toh isme ab shri shivji ke hatho me kuchh nahi hai, unhone unke haath me jo tha so kar diya. Ab aage sab bhagwan ke hatho me chhod dena hi uchit hai. Kyuki uspar tark vichar karnese kuchh nahi hoga. Kya sochenge? "Satiji mere vachno par vishwas kyu nahi karti? Satiji ko aaj kya ho gaya hai? Unko jane ki aagya nahi deni chahiye? Kya wo yogy hai?" Ye sab sochnese kya labh?

      Aur phir bhagwan shivji ko ye maalum hai ki satiji unke vachno par vishwas n kare aisa ho nahi sakta, parantu aaj aisa ho raha hai. Iska sidha arth ye hai ki aaj is samay wo apni prerna se nahi bhagwat prerna se kary kar rahi hai. Prabhu ramchandra ji ka iske pichhe koi dusra hi vidhan chhipa hai, jisko toh bas wahi jane, hum na hi soche toh achha hai.

      Saransh - apne hath me jo hai, wo apni budhhi aur man k anusar achhe se karna chahiye. Phal bhagwan k hath me chhod dena chahiye. Hamaare prayatn me koi truti na ho. Parantu hamare pure prayatn k baad bhi koi chij na ho toh wo bhagwat ichha samajh kar swikar kar lena chahiye aur uske liye sochna chhod dena chahiye.


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  5. प्रत्येक कर्मफल को रामजी की इच्छा मानकर मन में संतोष कर लेना और अपनी असफलता के कारणों को जानने का प्रयास भी न करना और फिर से प्रयत्न ना करना ये गलत है। कर्म तो करना ही चाहिए।

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  6. Book ka cover na padhe puri book padhe ...toh hi labh hoga...bekar mein discuss ka koi arth nahi...jai hai shri ram

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  7. लाजवाब.. शुक्रिया

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  8. कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जो जस कराई सो तस फल चाखा

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  9. Aati Sundar muje mera Uttar mil gya

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